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Aug-21-19 खुट्टी यादव हत्याकांड के अभियुक्त एडवोकेट चितरंजन सिंह को गोलियों से भुना

Divay Bharat / राष्ट्रीय /04-Apr-2019/Viewed : 13

पढ़े क्या है एनएसए, देशद्रोह और आफ़स्पा क़ानून? कैसे कांग्रेस कर रहीं है देशहितो के साथ खिलवाड़ ?

खुट्टी यादव हत्याकांड के अभियुक्त एडवोकेट चितरंजन सिंह को गोलियों से भुना

दिव्य भारत मीडिया, नई दिल्ली डेस्क : फ़रवरी 2019, ज़िला खंडवा, कांग्रेस शासित मध्य प्रदेश की पुलिस ने गोहत्या के मामले में तीन लोगों के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) के तहत मामला दर्ज किया.

जनवरी 2019, ज़िला बुलंदशहर, बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश की पुलिस ने बुलंदशहर हिंसा मामले में तीन लोगों के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगाया.

जनवरी 2019, में ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस ने भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 124ए के तहत देशद्रोह का मामला दर्ज किया

साल 2012 में यूपीए सरकार के दौरान कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को देशद्रोह की धाराओं के तहत गिरफ़्तार किया गया.

अब उसी यूपीए गठबंधन के सबसे बड़े दल कांग्रेस ने मंगलवार को जारी किए गए अपने घोषणापत्र में यह वादा किया है कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद उसकी सरकार बनती है तो वह देशद्रोह की धारा 124ए को समाप्त कर देगी.

इसके साथ ही कांग्रेस का वादा है कि वह सुरक्षाबलों को अतिरिक्त शक्तियां देने वाले आर्म्ड फॉर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट यानी आफ़्सपा और बिना ट्रायल के हिरासत में लिए जाने वाले एनएसए क़ानून में भी तब्दीली करेगी.

कांग्रेस ने यह वादा ही किया था कि सत्तारुढ़ बीजेपी ने उसकी आलोचना शुरू कर दी और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ बताया.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस पर यह तक कह दिया कि इस घोषणापत्र को ड्राफ़्ट करने वाले कांग्रेस अध्यक्ष के वे दोस्त हैं जो 'टुकड़े-टुकड़े' गैंग में रहे हैं.

कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही सरकारों के समय इन क़ानूनों का इस्तेमाल होता रहा है. लेकिन हाल ही में देखा गया कि इस क़ानून के तहत कई मामले दर्ज किए गए.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक़ सिर्फ़ 2014 में देशद्रोह के कुल 47 मामले दर्ज हुए जिनमें 58 लोगों को गिरफ़्तार किया गया. वहीं 2014 से 2016 के बीच अनुच्छेद 124ए के तहत 179 लोगों को गिरफ़्तार किया गया.

क्या है एनएसए, देशद्रोह और आफ़स्पा क़ानून?

सेडिशन लॉ या देशद्रोह क़ानून एक औपनिवेशिक क़ानून है जो ब्रिटिश राज के समय बना था.

अनुच्छेद 124ए के तहत अगर कोई भी व्यक्ति सरकार विरोधी सामग्री लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी सामग्री का समर्थन भी करता है तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सज़ा हो सकती है.

ब्रिटिश राज के समय इसका इस्तेमाल महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ तक किया गया था. इस पर मार्च 1922 में उन्होंने कहा था कि यह क़ानून लोगों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनाया गया है.

राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) को 1980 में लाया गया था. यह केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसी शक्तियां देता है जिसके तहत राष्ट्र हित में किसी भी शख़्स को बिना सूचना हिरासत में लिया जा सकता है.

इस क़ानून में बिना ट्रायल के किसी शख़्स को एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है. हाल ही में मणिपुर के टीवी पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम को एनएसए के तहत गिरफ़्तार किया गया था.

उन पर आरोप थे कि उन्होंने मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की आलोचना का एक वीडियो फ़ेसबुक पर पोस्ट किया था.

आर्म्ड फॉर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट यानी आफ़्सपा क़ानून सेना और अर्धसैनिक बलों को ऐसी शक्तियां देता है जिसके तहत वह किसी को भी हिरासत में ले सकते हैं और हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है. इसके लिए वह किसी क्रिमिनल कोर्ट में जवाबदेह भी नहीं होंगे.

आफ़्सपा किसी इलाक़े में लागू करने के लिए उसका अशांत घोषित होना ज़रूरी है. जम्मू-कश्मीर समेत यह क़ानून पूर्वोत्तर राज्यों के कई इलाक़ों में लागू है. 2015 में त्रिपुरा से यह क़ानून हटा दिया गया था.

क़ानून ख़त्म करना कितना सही?

एनएसए, देशद्रोह और आफ़्सपा जैसे क़ानूनों का ग़लत इस्तेमाल किए जाने की बातें हमेशा से उठती रही हैं. विभिन्न सरकारों पर अपने लाभ के लिए इन क़ानूनों का इस्तेमाल करने के आरोप लगे हैं.

कांग्रेस के इस वादे के साथ इन क़ानूनों पर फिर बहस तेज़ हो गई है. तो क्या इन देशद्रोह और एनएसए जैसे क़ानूनों को समाप्त करना ही बेहतर विकल्प है?

इस सवाल पर इंस्टीट्यूट फ़ॉर कॉन्फ़्लिक्ट मैनेजमेंट के एग्ज़िक्युटिव डायरेक्टर अजय साहनी कहते हैं कि क़ानून ख़त्म करना विकल्प नहीं है क्योंकि किसी भी क़ानून का ग़लत इस्तेमाल किया जा सकता है. वह कहते हैं कि ऐसे क़ानूनों में इनका ग़लत इस्तेमाल करने वालों के लिए सज़ा का प्रावधान होना चाहिए.

अजय साहनी कहते हैं, "कुछ अशांत इलाक़े और लोग ऐसे होते हैं जिन पर आप तुरंत कार्रवाई नहीं कर सकते हैं. ऐसे में एनएसए जैसा क़ानून बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह अस्थाई तौर पर शक्तियां देता है. आप उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकते हैं."

देशद्रोह जैसे क़ानून का हाल में काफ़ी इस्तेमाल किया गया है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कथित भारत विरोधी नारों से लेकर गोहत्या के अभियुक्तों पर यह लगाया गया.

इस क़ानून के नाजायज़ तरीक़े से इस्तेमाल पर अजय साहनी कहते हैं कि यह देशद्रोह क़ानून की परिभाषा आज तक साफ़तौर से स्पष्ट नहीं है और देखा गया है कि इसमें आज तक जो भी मामले दर्ज हुए हैं, वह लंबे खिंचते चले जाते हैं और उनका कोई असर नहीं होता.

क़ानूनों के राजनीतिक इस्तेमाल पर वह कहते हैं कि देशद्रोह क़ानून का सरकार के आलोचकों के ख़िलाफ़ राजनीतिक इस्तेमाल अधिक हुआ है.

उनका कहना है, "दुनियाभर का रुझान अगर देखें तो लोकतांत्रिक देशों में देशद्रोह क़ानून हटाए जा रहे हैं. इस क़ानून पर बहुत समय से सहमति बनती दिख रही है कि इसे हटा दिया जाए."

देशद्रोह क़ानून ब्रिटिश राज के वक़्त लाया गया था. इसे 1837 में ब्रिटिश इतिहासकार और राजनीतिज्ञ थॉमस मैकाले ने ड्राफ़्ट किया था. दिलचस्प बात यह है कि भारत इस क़ानून पर अभी अमल कर रहा है जबकि ब्रिटेन में यह कब का समाप्त कर दिया गया है|

फिर क्या है हल?

सहारनपुर में दलितों और सवर्णों के बीच हिंसा के बाद भीम आर्मी के चीफ़ चंद्रशेखर आज़ाद को 2017 में एनएसए के तहत गिरफ़्तार किया गया था. वह बिना कोई सुनवाई तकरीबन छह महीने तक जेल में रहे.

इस क़ानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के बाद उन्हें ज़मानत दी गई थी. चंद्रशेखर का केस लड़ने वाले और मानवाधिकार कार्यकर्ता कॉलिन गॉन्ज़ालविस कहते हैं कि अगर कांग्रेस पार्टी ने देशद्रोह और एनएसए जैसे क़ानून में तब्दीली की बात की है तो यह स्वागत योग्य है.

कॉलिन कहते हैं, "यह ख़ुशी की बात है लेकिन मैं राजनेताओं की बात पर यकीन नहीं करता. एनएसए से अगर वह ग़लत प्रावधान हटाते हैं तो यह लोगों के लिए अच्छा ही होगा लेकिन इस देश में एनएसए और देशद्रोह दोनों ही क़ानूनों की कोई ज़रूरत नहीं है."

वह कहते हैं, "इन क़ानूनों का ख़ासकर इस्तेमाल विरोधी कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ किया गया. चंद्रशेखर के ख़िलाफ़ पहली बार कई एफ़आईआर हुई और उसमें भी सीधे एनएसए लगा दिया गया. इन क़ानूनों का दुरुपयोग ही हो रहा है जिसे ख़त्म कर देना चाहिए."

हालांकि, आफ़स्पा जैसे क़ानून पर अजय साहनी और कॉलिन के विचार अलग हैं. अजय साहनी कहते हैं कि आफ़्सपा में कोई ऐसी चीज़ नहीं लिखी है कि फ़ौज को कोई ग़लत काम करने की इजाज़त है.

वह कहते हैं, "यहां पर भी क़ानून के इस्तेमाल का सवाल है. सैन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ जांच को लेकर हमेशा सवाल उठते हैं कि उनके विभाग की अनुमति के बिना जांच नहीं हो सकती. ऐसे प्रावधान हर सरकारी विभाग में हैं जहां अनुमति के बिना जांच नहीं हो सकती."

अजय साहनी कहते हैं कि अगर आफ़्सपा क़ानून से कुछ ग़लत हो रहा है तो वह उसको करने वाला ज़िम्मेदार है, इस क़ानून में कोई ख़ामी नहीं है.

वहीं, कॉलिन कहते हैं कि जिस क़ानून में शक के बिना पर किसी को भी गोली मारने की अनुमति हो, वैसा क़ानून ख़त्म कर दिया जाना चाहिए.

साल 2019 की शुरुआत से लेकर अब तक कई लोगों पर देशद्रोह और एनएसए के मामले दर्ज किए जाने के मामले सामने आ चुके हैं. जिनमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के 14 छात्रों समेत साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हीरेन गोहेन और त्रिपुरा की आईएनपीटी के नेता जगदीश देबबर्मा जैसे नेता शामिल हैं.

मोदी सरकार के दौरान दर्ज हुए कई देशद्रोह के मामलों को कांग्रेस पार्टी ने मुद्दा ज़रूर बनाया है. वहीं, मोदी सरकार कांग्रेस को देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाला बता रही है.

राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर जीवित यह क़ानून कब ख़त्म या परिवर्तित होते हैं यह तो सही-सही कोई नहीं बता सकता.

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