Wednesday, 21st August, 2019
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Aug-21-19 खुट्टी यादव हत्याकांड के अभियुक्त एडवोकेट चितरंजन सिंह को गोलियों से भुना

Divay Bharat / आज की खबर /02-Jan-2019/Viewed : 14

वन्दे मातरम- राजनीतिक कुंठा का होता शिकार

खुट्टी यादव हत्याकांड के अभियुक्त एडवोकेट चितरंजन सिंह को गोलियों से भुना

हमारे देश के किसी भी राज्य में जब भी सत्ता परिवर्तन होता है तब सत्ताधारी दल या तो राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर या अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में प्रारंभ की गई योजनाओं, परियोजनाओं को या तो बंद कर देती है या उसमे व्यापक बदलाव करती है. सत्ता में काबिज होते ही भारी संख्या में सरकारी अफसरों का रातोंरात तबादला भी उनके राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा हुआ करती है. हमारे देश के राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए ऐन-केन-प्रकारेण वाली नीति का पालन अत्यंत सिद्धत से निभाते हैं इसमें कोई शक नहीं. कोई दल हिन्दू तुष्टिकरण की राजनीतिक चाल चलता है तो कोई मुस्लिम तुष्टिकरण में अपना एवं अपने दल का भविष्य देखता है. राष्ट्र के सम्मान से जुड़ा विषय भी यदि उनके क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम हों तो उसे भी नीलाम करने से स्वयं को पीछे नहीं रखेंगे. राष्ट्रीय अस्मिता जैसा शब्द उनके शब्दकोश का हिस्सा नहीं हुआ करती हैं. हालिया घटना इस बात की स्वतः तस्दीक कराती है कि ये बातें शब्दों में पिरोई गई वाक्यांश मात्र नहीं है बल्कि इसके पीछे सच्चाई भी परिलक्षित होती है.

मध्यप्रदेश के नवनियुक्त मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पदभार ग्रहण करने के साथ ही अपने वक्तव्यों एवं कार्यों से जैसे विवादों को जन्म देने का निश्चय कर लिया हो. मध्यप्रदेश में बिहार और उत्तरप्रदेश के युवाओं को सरकारी नौकरी में वरीयता न देने जैसे उनके बयान का अभी शोर थमा भी नहीं था कि उन्होंने पुनः एक नया विवाद खड़ा कर दिया. 2005 में बाबूलाल गौर कि सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को राष्ट्र के प्रति सम्मान रखने के दृष्टिकोण से महीने के प्रथम दिन वन्दे मातरम गाने की शुरुआत की थी. पिछले 13 वर्षों से यह परंपरा निर्विरोध चलती आ रही थी. परन्तु बतौर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सत्ता हासिल करते ही इस पुरानी परंपरा को आइना दिखा दिया. इतना ही नहीं उन्होने सफाई देते हुए यह भी कहा कि राष्ट्रभक्ति साबित करने के लिए वन्दे मातरम गाना अनिवार्य नहीं.

ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वभाविक हो जाता है कि क्या राष्ट्रगीत जो कभी देश की आजादी के लिए मर मिटने वाले क्रांतिकारियों के लिए शुभ वाक्य हुआ करती थी पर प्रतिबन्ध लगा कर इन्होने राष्ट्रीय अस्मिता के साथ खिलवाड़ नहीं किया है? क्या उन्हें यह याद नहीं रखनी चाहिए कि जिस संविधान के तहत आज वे मुख्यमंत्री बने बैठे हैं वही संविधान वन्दे मातरम को राष्ट्रीय गीत का दर्जा भी देती. सत्ता में बने रहने के लिए पूर्ववर्ती सरकार के फैसले को बदलना कोई नया नहीं है परन्तु राष्ट्र से जुडी भावनाओं पर कुठाराघात करना, उसमे बदलाव करने की नियत रखना, उसपर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करना देश के साथ छल करने के समान है. तुष्टिकरण के लिए राष्ट्रीय अस्मिता को दांव पर लगाने वालों को यह सोंचना चाहिए कि देश और देशभक्ति से सर्वोपरि कुछ भी नहीं है

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