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Aug-21-19 खुट्टी यादव हत्याकांड के अभियुक्त एडवोकेट चितरंजन सिंह को गोलियों से भुना

Divay Bharat / राष्ट्रीय /22-Mar-2019/Viewed : 14

बिहार दिवस : इतिहास के नजरों से

खुट्टी यादव हत्याकांड के अभियुक्त एडवोकेट चितरंजन सिंह को गोलियों से भुना

पटना डेस्क : इन जोश और खरोश में बिहार के विभाजन के सही अर्थ को समझने के लिए हमें इतिहास के उन पन्नों से रू-ब-रू होने की जरूरत है, जिनको याद करने का मतलब अतीत से ग्रस्त होना नहीं, बल्कि उसके गौरव से प्रेरणा लेने और उसे आवश्यक व उपयोगी मान कर प्रासंगिक बनाने और अंतत: चरितार्थ करने से है.

बिहार के इतिहास के बगैर भारत का इतिहास अधूरा

बिहार के इतिहास के बगैर भारत का इतिहास अधूरा है. बिहार के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने, उन्हें संरक्षित करने की जरूरत है, ताकि परंपरा को प्रगति से जोड़ कर इतिहास को आगे ले जाया जा सके. आखिर इतिहास सिर्फ पढ़ने नहीं, बल्कि समाज को समझने और उसे बदलने का भी उपकरण है. अपने अतीत को जानना इसलिए जरूरी है कि इससे हमें गौरव बोध होता है और भविष्य गढ़ने में मदद मिलती है. गौरवशाली इतिहास हमें प्रेरणा देता है, तो कोई काल खंड गलतियां न दोहराने का सबक भी देता है.

लंबे समय तक भारत की राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है बिहार

बिहार लंबे समय तक भारत की राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है. इसी तरह बिहार पुरातन काल से सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा है. महात्मा बुद्ध के काल से यदि शुरू किया जाये, तो उस समय हर्यक वंश का शासन था. बिम्बिसार इस वंश के राजा थे. उनके पुत्र अजातशत्रु ने अपने शासन का विस्तार भारत के बड़े भू-भाग पर किया. इसके बाद नंद वंश का शासन रहा. अधिकतर क्षेत्र में उसका शासन रहा. फिर मौर्य वंश का शासन आया. इसके राजा चंद्रगुप्त ने अपने गुरु कौटिल्य के साथ मिल कर शासन का विस्तार किया. गुप्त वंश के शासन में समृद्धि आयी.

इसी तरह उत्तर वैदिक काल में जायें, तो वैदिक साहित्य, ब्राह्मण ग्रंथ, उपनिषद, महाकाव्य आदि की रचनाएं बिहार में ही हुई. मिथिला के राजा का दरबार काफी समय तक पूरे भारत की सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा. वहां दार्शनिक शास्त्रार्थ और ज्ञान प्राप्ति के लिए आते थे. इसके प्रमाण प्राचीन साहित्य में भरे पड़े हैं. मिथिला के जनकवंशी अंतिम राजा के समय लोकतंत्र की स्थापना हुई थी, जो दुनिया का सबसे पुरानी गणतांत्रिक शासन पद्धति थी.

नालंदा विश्वविद्यालय जैसे विश्व धरोहर

यहां नालंदा विश्वविद्यालय और बिक्रमशिला महाविहार उच्च कोटि के शिक्षण संस्थान थे. यहां देश-विदेश के विद्यार्थी धर्म, विज्ञान, दर्शन आदि की शिक्षा ग्रहण करने आते थे. इनके बारे में उपलब्ध प्रमाण बताते हैं कि हमारे पुरखों ने इनके निर्माण में कितना अथक प्रयास किया होगा. गुप्तकाल के दौरान बिहार में नालंदा विश्व-विद्यालय विश्वभर में अपनी अकादमिक साख के लिए प्रसिद्ध था. यहां पढ़ने के लिए दुनियाभर से छात्र आते थे. बाद में मुसलिम शासकों के आक्रमणों ने नालंदा को तहस-नहस कर दिया. आज भी इसके खंडहर बिहार में मौजूद हैं. 

बिहार से जुड़ी है बौद्ध धर्म की जड़े

बिहार वह ऐतिहासिक जगह है जहां भगवान बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ. दुनियाभर में अपनी पैठ बना चुके बुद्ध धर्म की जड़े बिहार के बौद्ध गया से जुड़ी हैं. यही नहीं जैन धर्म के संस्थापक भगवान महावीर का जन्म राजधानी पटना के दक्षिण-पश्चिम में स्थित पावापुरी कस्बे में हुआ और उन्हें निर्वाण भी बिहार की धरती पर ही प्राप्त हुआ था.

सिख इतिहास में पटना है खास

सिखों के दसवें और आखिरी 'गुरु' गुरु गोबिंद सिंह का जन्म भी राजधानी पटना के पूर्वी भाग में स्थित हरमंदिर में हुआ, जहां आज एक भव्य गुरुद्वारा भी है. इसे आज पटना साहिब के रूप में भी जाना जाता है, जो सिखों के पांच पवित्र स्थल (तख्त) में से एक है.

समाट अशोक ने भी बिहार की धरती पर किया राज

अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य (चाणक्य) का जीवन भी बिहार की धरती पर ही व्यतीत हुआ. चाणक्य मगध के राजा चंद्रगुप्ता मौर्य के सलाहकार थे. 302 ईसा पूर्व यूनान के महान सम्राट एलेक्जेंडर (सिकंदर) का दूत मेगास्थनीज और सेनापति सेल्युकस नेक्टर ने भी मौर्यकालीन पाटलीपुत्र में काफी समय बिताया. 270 ईसा पूर्व अशोक महान ने भी बिहार की धरती पर राज किया. भारत के राष्ट्रीय निशान अशोक स्तंभ है और राष्ट्रीय ध्वज में अशोक चक्र सम्राट अशोक की ही देन है.

मध्यकालीन इतिहास में बिहार है खास

मुगल काल में दिल्ली सत्ता का केंद्र बन गया, तब बिहार से एक ही शासक शेरशाह सूरी काफी लोकप्रिय हुआ. आधुनिक मध्य-पश्चिम बिहार का सासाराम शेरशाह सूरी का केंद्र था. शेरशाह सूरी को उनके राज्य में हुए सार्वजनिक निर्माण के लिए भी जाना जाता है.

आधुनिक इतिहास में बिहार है खास

ब्रिटिश शासन में बिहार बंगाल प्रांत का हिस्सा था, जिसके शासन की बागडोर कलकत्ता में थी. हालांकि इस दौरान पूरी तरह से बंगाल का दबदबा रहा लेकिन इसके बावजूद बिहार से कुछ ऐसे नाम निकले, जिन्होंने राज्य और देश के गौरव के रूप में अपनी पहचान बनाई. इसी सिलसिले में बिहार के सरन जिले के जिरादेई के रहने वाले डॉ. राजेंद्र प्रसाद का नाम आता है. वह भारत के पहले राष्ट्रपति बने.
1912 में बंगाल प्रांत से अलग होने के बाद बिहार और उड़ीसा एक समवेत राज्य बन गए, जिसके बाद भारतीय सरकार के अधिनियम, 1935 के तहत बिहार और उड़ीसा को अलग-अलग राज्य बना दिया गया. 1947 में आजादी के बाद भी एक राज्य के तौर पर बिहार की भौगौलिक सीमाएं ज्यों की त्यों बनी रहीं. इसके बाद 1956 में भाषाई आधार पर बिहार के पुरुलिया जिले का कुछ हिस्सा पश्चिम बंगाल में जोड़ दिया गया.

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से बिहार का पुनरुत्थान

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक तरह से बिहार का पुनरुत्थान हुआ. बिहार से ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की. गांधीजी के पहले आंदोलन की शुरुआत भी चंपारण से ही हुई. अंग्रेजों ने गांधी जी की बिहार यात्रा के दौरान उन्हें मोतीहारी में जेल भी भेज दिया था. आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन को कौन भुला सकता है. जेपी आंदोलन न सिर्फ बिहार बल्कि पूरे देश को साथ लेकर चला. बिहार की राजनीति और सामाजिक स्थिति में इसके बाद काफी बदलाव हुए.

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